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Graduation Day!

  • Writer: Aadishaktii S.
    Aadishaktii S.
  • Jan 20, 2025
  • 2 min read

This post is sourced from my old blog.

Original Blog Date: December 28, 2023


"जैसे उनके दिन बहुरे, वैसे सबके दिन बहुरें!" 🪹

२०२३ की सर्वोच्च स्मृतियों में से एक अपनी 'पसंदीदा' स्नातक डिग्री में बेहतरीन प्रदर्शन देना भी था। स्वर्ण पदक प्राप्त करना अवश्य ही सुख व गर्व का विषय है, परंतु उससे भी अधिक यह अचरज का विषय है! मैं ये नहीं कह रहा कि मैं इस सम्मान या सराहना के योग्य नहीं हूं।

पर अचंभा मुझे इस बात पर है कि मैंने सही मायनों में जो सीखा, उसके अंक किसी मार्कशीट में नहीं जोड़े जाते। और जिन विषयों के अंक जुड़े, उनके अंकों का लेखा जोखा कभी मैने किया नही।


मैने वास्तव में जो सीखा, वो यह था कि एक गहरी सांस ले कर "भाड़ में जाए" बोलने की शक्ति अटूट है। मैने सीखा कि रोना वहीं जहां तुम्हारे आंसू मोती समान मूल्य रखते हैं। मैंने सीखा कि जो लोग एक दिन तुम्हारे हर सुख और दुख के सबसे बड़े स्तंभ बनते हैं वो दूसरे दिन तुम पर गिर कर तुम्हारी दुनिया भी ध्वस्त कर सकते हैं। मैने सीखा की दुनिया में दुख अपार हैं, और उनमें से अधिकतर आपको अप्रतिम कहानियां दे जाएंगे। सीखा कि कभी कभी कुछ चीजें बस होने के लिए हो जाती हैं, उनसे हमेशा कुछ सीखना संभव नहीं है। सीखा कि क्रोध शक्ति भी है और निर्बलता भी। मैंने सीखा कि 'कोई बात नही, होता है'। मैंने सीखा कि घोंसला मैं नहीं छोड़ता, घोंसला मुझे फेंक देता है। मैंने देखना सीखा, सुनना सीखा, सोचना समझना सीखा। मैने देखा, मैंने सुना, मैने सोचा, मैंने सीखा।


इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है, कि मैंने फिल्म बनाने से लेकर, दोस्तों का साथ छूटने तक, पहली तनख्वाह से लेकर पहली बार नौकरी से निकाले जाने तक सब कुछ देखा, महसूस किया, और सीखा।


मैं आभार व्यक्त करता हूं मेरी परममित्र दिव्या का, जिन्होंने इस साल में घर से दूर मेरा घर बनने की ज़हमत उठाई। जिन्होंने 'Valedictorian' के अवसर पर मेरे पदक को ग्रहण करने के लिए 'हमारे' हाथ आगे बढ़ाए, जिन्होंने 'Convocation' के मौके पर भीड़ में रोते चिल्लाते मेरे एकाकीपन को गोद में उठाकर वापस भेज दिया। और जिन्होंने इस बेवजह विचलित कर देने वाले सप्ताह के बीतने के पश्चात भी इस यादगार पल को कैमरा में कैद करने की सुंदर सफल पहल की।


आभार मेरे परिवार, मेरे स्थाई निवास तथा उसमे मेरा हौसला बढ़ाते तीन व्यक्तियों को जिन्होंने जैसे भी बन पड़ा, मेरा साथ दिया।


आभार उन सबको, जो कि मेरी scmc की ओझल स्मृतियों में जब तब अपना cameo दे देते हैं। आभार जिनको याद करके मैं मुस्कुराता हूं, खिलखिलाता हूं या रोने को हो पड़ता हूं। आप सब की स्मृतियां मुझे प्रिय हैं।


प्रो. बैदूर्य को मेरा सादर नमस्कार

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