To be loved is to be seen
Updated: Feb 23, 2025
एक आदमी ने मुझे कई आँखों के चाबुकों से एक बार बचाया था। वो कई आँखें मुझे उन चीज़ों को लेकर शर्मिंदगी की खाई में ठेलना चाहती थीं जिन चीज़ों के विषय में सोच कर मैं रोज़ अपनी चिता को स्वयं आग देती थी। ऐसी चीज़ें जिनके होने पर मैं थोड़ा सा मर गई, और फिर इन तानों की बदौलत रोज़ उस मौत को जीती भी रही।
इन आँखों में एक जुगल मेरी आँखें भी थीं। मैं खुद को भी नहीं देखना चाहती थी, और न ही किसी और को।
पर इस आदमी ने मुझे इन सभी आँखों से बचा लिया था, अब अगर किसी की नज़र मायने रखती थी, तो वो थी केवल उसकी। मुझे क्या था, मैंने अपनी आँख पर पट्टी बांधी, उसका हाथ थामा, और उसके साथ चल पड़ी। रास्ते सब सीधे सहज थे, कोई नदी पर्वत पार नहीं करने पड़े। पर एक दिन, उसने भी मुझे देखना बंद कर दिया। अब मुझे कोई नहीं देख सकता था। पर मुझे चलने का आभास अब भी हो रहा था। कभी कभी वो इतनी तेज़ चलने लगता था कि मेरा हाथ उसके हाथ से छूट जाता था। पर मैं दौड़ कर उसका हाथ दोबारा थाम लेती थी। कुछ खाल मेरी आँखों के चाबुकों ने उधेड़ दी थी, और कुछ ये आँख बंद कर के दौड़ने पर छिल गई। कुछ समय बाद मेरे खूब दौड़ने, ज़मीन पर लिथड़ने के बावजूद उसका हाथ मेरे पकड़ में नहीं आया। मैं आँख बंद करके चलती रही, कहीं टकराती, कहीं ठोकर खाती। और फिर मुझे आभास हुआ, कि मैं एक चौराहे के बीचों बीच खड़ी हूँ। आँखें से पट्टी हटाने के लिए मजबूर हुई। आँख खुली तो मैंने चारों दिशाओं का यातायात रोक रखा था। गाड़ी में बैठे हर शख्स को मैं जानती थी। वो मुझे घृणा से देख रहे थे। एकाएक मुझे आभास हुआ, कि मेरे तन को ढकने के लिए अब मेरी खाल तक मेरे पास नहीं है, और मेरे नमकीन आंसुओं से मेरे चोटिल बदन की धूल तो धुल रही है, पर मेरा हर अंग जल भी रहा है। मेरे कंठ से जो आवाज़ें आ रहीं हैं वो गाड़ियों की भोपुओं से भी ज़्यादा कर्कश हैं। ये दृश्य बड़ा ही वीभत्स है, और ये मुझसे देखा नहीं जा रहा।
कोई अपनी गाड़ी से नहीं उतरा।
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