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लगता है अब रात होने वाली है।

  • Writer: Aadishaktii S.
    Aadishaktii S.
  • Feb 23, 2025
  • 2 min read

कुछ समय पूर्व एक आहट हुई जिसने हमारे कानों में एक शहद सी मीठी अफ़वाह घोल दी। बोली कि शायद सूर्योदय हो रहा है। हम उत्साहित हुए ही थे कि हमको फिर एक बार ये एहसास हुआ कि हमको तो पश्चिम की ओर मुँह करके रेत में गाड़ दिया गया है। सूरज कबसे डूब रहा है। हम रेत में थोड़े और धँस गए हैं। अँधेरा हो रहा है। लगता है अब रात होने वाली है।


अब सुबह ना ही हो। क्योंकि हम थक गए हैं। थक गए हैं, ये सुन-सुन के, कि उगते हुए सूर्य में तेज होता है। ये सुन के, कि जिनको ये सूरज दिख रहा है, वो इसके लाभ भोग रहे हैं। ये सुन के, कि सुबह के सूर्य की किरणों के स्पर्श से सेहत अच्छी रहती है। ये सुन के, कि "अरे सूर्योदय रोज़ होता है, तुम देखो तो!"

हम चीख रहे हैं, रो रहे हैं, पर न जाने किस भाषा में कि किसी को समझ ही नहीं आ रहा है कि हमको तो पश्चिम की ओर मुँह करके रेत में गाड़ दिया गया है। सूरज कबसे डूब रहा है। हम रेत में थोड़े और धँस गए हैं। अँधेरा हो रहा है। लगता है अब रात होने वाली है।


धूप जिनको दिख रही है, उनके चेहरे हमको दिख रहे हैं। दमकते हैं, खिलते हैं। उनकी आँखों में हमको हम दिखते हैं। और फिर दिखती है अपनी बेढब परछाईं इस रेत पर। लोग कहते हैं, "कम से कम धूप के कारण तुम्हारी परछाईं कितनी विशालकाय है! जितनी तेज़ धूप, उतनी बड़ी परछाईं। इस परछाईं में खड़े होकर लोगों को छाँव मिल रही है।" पर हमारी पीठ जल चुकी है, सर तप गया है, क्योंकि हमको तो पश्चिम की ओर मुँह करके रेत में गाड़ दिया गया है। सूरज कबसे डूब रहा है। हम रेत में थोड़े और धँस गए हैं। अँधेरा हो रहा है। लगता है अब रात होने वाली है।


रात होगी तो कैसा रहेगा? हमको तो पता होना चाहिए। रात भी क्योंकि रोज़ होती है।

पर जिस रात का इंतज़ार है और जिसके विचार मात्र से रूह काँप रही है, वो रात ऐसी है जिसके बाद सूरज हमारी पीठ नहीं जला पाएगा, हमको सूरज में नहाए सुंदर चेहरे भी नहीं दिखेंगे। हमारी परछाईं भी ग़ायब हो जाएगी।

क्योंकि हम पश्चिम की ओर मुँह करके गड़े रह गए। सूरज एक आख़िरी बार सदा के लिए हमको लेकर डूब गया। हम रेत के अंदर समा गए। अब सिर्फ़ रात ही रात है।

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