कथक: जीवन का आवर्तन
- Aadishaktii S.
- Jan 23, 2025
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CONTEXT: The piece, in each of its paragraphs talks about these things, in order- Taal cycle, thaat, aamad, paran-aamad and ladi. It equates concepts of kathak to life.
काल चक्र, और नीर चक्र और कुल नवग्रह का फिरना
चक्रबद्ध है माटी में हर वृक्ष-बीज का मिलना!
हर एक कदम पे बीज है कुछ गतिविधियाँ और बढ़ाता
तनिक तने में लोच डाल कर बाँहें-हरित बलखाता।
वो मनभावन फूलों से फल, फिर फल से बीज में बदले
फिर मिट्टी के सम पर आके, आवर्तन पूरा कर ले।
रुक करके कुछ क्षण को तुम स्थिरता में आंदोलन ढूँढो
झूमे हैं कैसे वृक्ष मगन, तुम भी संग उनके झूमो।
पहले तने को धीरे वो दाएँ से बाएँ झुलाए
जैसे नर्तक अपने तन को है ताल पर लहराए।
वो जड़ें दृढ़ रखकर माटी पर, और विस्तार बढ़ाए
घुँघरू से लिपटे अडिग पाँव जो सहज कोई थिरकाए।
नरमी से शाखाएँ खुलतीं, और हाथ हरे लहराते हैं
जैसे मेहंदी से रँगे दो-दो हस्त मगन बलखाते हैं।
कैसी स्थिरता, कैसी दृढ़ता, और कैसा सुंदर भाव-प्रवाह
है नृत्य धरा के कण-कण में, जैसे प्राणों से पूर्ण हवा।
हर लहर ज़रा इठलाती है, बलखाती है और गाती है
वो सहज प्रवाह में देखो कैसे निहित नृत्य दिखलाती है।
वो कोमलता से एक बहाव में अपनी ताल को सुनती है
और उस पर अपनी लचक, गति और भाव स्वयं ही चुनती है।
ललित सुशोभित शर्मीली एक छुईमुई की बेल तले
तुम गौर करो उसके छुपने में कितने कथक के बोल पलें!
प्रकृति की सबसे श्रेष्ठ और अनमोल भेंट है भाव मनुज के
प्रेम, भाव, रस, कला, नृत्य, नहीं एक दूसरे से अलग हैं।
विश्व भर एक तालमेल है कुछ स्त्रीत्व-कुछ पौरुष का
हम सबमें थोड़ा सा हिस्सा है थोड़े तमस और आरुष का।
पुरुषत्व की गाथा गाता पर्वत, स्त्रीत्व में नदियाँ नाची हैं
कलाक्षेत्र कथक का भी, ऐसी ही सुंदर घाटी है।
पर्वत को काटे कोई सरिता, कभी सरिता को मोड़े पर्वत
कभी पग छूके नदी सरपट भागे, कभी पर्वत बाँधे नदी सिर पर।
यही वादियों सी जुगलबंदी अपने पौरुष और नारीत्व की
हमें हमारी छवि देती है, प्रकृति प्रतीक नर-नारी की।
पर अब कहाँ नदी, झरने, वादी और पर्वत याद रहे
लगता है ज्यों जाती रेल के पीछे हम सब देखो भाग रहे।
कैसी हड़बड़, धड़-धड़, सरपट सी जीवन की रफ़्तार हुई
सारी स्थिरता, आराम, सादगी, अब बीती सी बात हुई।
हम कैसे अपने जीवन में रुक के सौंदर्य का ध्यान करें
अब वर्तमान की रेल को पकड़ें, और भविष्य से आप डरें।
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